• विश्वनाथ खंड

विश्वनाथ खंड

दक्षिण में दशाश्वमेध घाट, पश्चिम में गोदौलिया और उत्तर में नदी की तरफ पड़ने वाले मणिकर्णिका घाट के बीच बसा पुराना शहर वाराणसी का दिल कहलाता है। इसे अक्सर विश्वनाथ खंड के नाम से भी निरूपित किया जाता है।

इस पूरे इलाके के कोने-कोने में अनगिनत मंदिर और शिवलिंग स्थापित हैं। यही कारण है कि यह इलाका श्रद्धालुओं, पुजारियों और पूजा सामग्री बेचने वालों से गुलजार रहता है।

कई संकरी गलियों से होते हुए पहुंचते हैं विश्वनाथ गली में। यह हमें ले जाती है विश्वनाथ मंदिर में, जिसे स्वर्ण मंदिर भी कहते हैं। इसका यह नाम मंदिर के शिखर पर चढ़ी सोने की परत के कारण पड़ा। एक विशालकाय दीवार के पीछे और एक अहाते में पड़ता है भारत देश का सबसे महत्वपूर्ण शिवलिंग। चिकने काले पत्थर से बना यह शिवलिंग चांदी की चौकी पर विराजमान है। यहीं पर हैं महाकाल और दंडपाणि के मंदिर। अविमुक्तेश्वरा का शिवलिंग भी यहीं पर है। मंदिर के इस वर्तमान स्वरूप का निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने 1777 में कराया था।

बाबा विश्वनाथ का इतिहास काफी मिला-जुला रहा है। इस मंदिर पर मुस्लिम शासकों ने बार-बार आक्रमण किया और हर हमले को झेलने के बाद इसका फिर पुनर्निर्माण कराया गया। 1585 में बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक राजा टोडर मल ने मंदिर के विशाल प्रासाद का निर्माण कराया लेकिन औरंगज़ेब ने इसे फिर तहस-नहस कर दिया। यही नहीं औरंगज़ेब ने यहीं पर ज्ञान व्यापी मस्जिद का भी निर्माण कराया। यहां स्थित कुए से सिर्फ मंदिर के पुजारी ही पानी ले सकते हैं। अन्य कोई भी यहां प्रवेश नहीं कर सकता। यही वह स्थान है जहाँ तीर्थयात्री पंचतीर्थ यात्रा शुरू करने से पहले संकल्प लेते हैं।

इसी के पास स्थित है अन्नपूर्णा भवानी का मंदिर, जो सर्वोच्च देवी शक्ति को समर्पित है। इन्हें तीनों लोकों की माँ भी कहा जाता है। भरण-पोषण करने वाली माँ होने के कारण इनके हाथों में माँ दुर्गा या माँ काली की तरह कोई हथियार नहीं है, बल्कि एक अक्षय पात्र है। कहते हैं कि यह पात्र कभी भी खाली नहीं होता। इनके पास ही है भगवान शनिदेव की मूर्ति। अपने रूठे भाग्य को मनाने के लिए शनिवार को हजारों श्रद्धालु यहां शनिदेव के दर्शन और पूजन करने आते हैं।